5 सितंबर , 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : अमृतसर में एक महिला के कथित अपहरण और दुष्कर्म के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश के बावजूद नई जांच शुरू नहीं होने का आरोप पीड़ित परिवार ने लगाया है। परिवार का कहना है कि अदालत के स्पष्ट निर्देश के बाद भी अब तक किसी अधिकारी ने उनसे संपर्क नहीं किया है और न ही उन्हें जांच में शामिल होने के लिए बुलाया गया है।
27 वर्षीय महिला ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर गुरविंदर सिंह उर्फ गुरी चहल, जो मोहाली निवासी और मूल रूप से गुरदासपुर का रहने वाला है, पर शादी का झांसा देकर कथित तौर पर उसका अपहरण करने और दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था। मामले ने बाद में राजनीतिक विवाद का रूप भी ले लिया, जब विपक्ष ने आरोप लगाया कि पंजाब के मुख्यमंत्री की पत्नी ने केस को दबाने के लिए रिश्वत ली थी। मुख्यमंत्री की पत्नी ने इन आरोपों से इनकार किया है।
20 जुलाई को हाईकोर्ट ने दिए थे निर्देश
मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 20 जुलाई 2026 के आदेश में जांच को नए सिरे से और निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए थे। अदालत ने पंजाब के DGP को निर्देश दिया था कि जांच की निगरानी स्पेशल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, महिला मामले/महिला कल्याण के स्तर पर कराई जाए।
अदालत ने यह भी कहा था कि जांच की जिम्मेदारी ऐसे वरिष्ठ राजपत्रित पुलिस अधिकारी को दी जाए, जो पहले इस मामले की जांच से जुड़ा न रहा हो। नए अधिकारी को अब तक एकत्र किए गए सभी रिकॉर्ड और सामग्री की स्वतंत्र रूप से समीक्षा करते हुए जांच को वस्तुनिष्ठ, निष्पक्ष और तेजी से आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया था।
परिवार का दावा—अब तक नहीं किया गया संपर्क
हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद भी पीड़ित परिवार का कहना है कि नई जांच की प्रक्रिया जमीन पर शुरू होती दिखाई नहीं दे रही है। पीड़िता के पिता के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि अब तक किसी अधिकारी ने परिवार से संपर्क नहीं किया और उन्हें जांच में शामिल होने के लिए नहीं बुलाया गया।
परिवार का आरोप है कि उसने पहले ही पुलिस और अदालत के समक्ष पीड़िता के बयान दर्ज कराए थे। ऐसे में परिवार चाहता है कि हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप एक नया अधिकारी मामले की पूरी जांच करे और पहले से जुटाए गए साक्ष्यों की स्वतंत्र समीक्षा करे।
अप्रैल में दर्ज हुई थी FIR
मामले में FIR 29 अप्रैल 2026 को अमृतसर के सिविल लाइंस पुलिस स्टेशन में पीड़िता के पिता की शिकायत पर दर्ज की गई थी। शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2) के तहत मामला दर्ज किया गया था। बाद में पीड़िता के बयान दर्ज किए जाने के बाद दुष्कर्म से संबंधित धारा भी जोड़ी गई।
परिवार की ओर से अदालत में आरोप लगाया गया था कि महिला को शादी का झांसा देकर अपने साथ ले जाया गया और उसके साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाए गए। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया था कि आरोपी ने महिला की आपत्तिजनक तस्वीरें खींचीं और उन्हें सोशल मीडिया पर प्रसारित करने तथा परिवार को भेजने की धमकी देकर कथित तौर पर ब्लैकमेल किया।
आरोपी को पुलिस ने किया था गिरफ्तार
पुलिस ने इस मामले में गुरविंदर सिंह उर्फ गुरी चहल को आरोपी बनाया था और बाद में उसे गिरफ्तार भी किया गया। हालांकि, बाद में उसे मामले से डिस्चार्ज कर दिया गया। पुलिस का कहना था कि पीड़िता ने जांच में शामिल होकर सहयोग नहीं किया था।
दूसरी ओर, पीड़िता के परिवार ने इस दावे का विरोध किया। परिवार का कहना है कि महिला ने पुलिस के सामने भी अपना बयान दर्ज कराया था और अदालत में भी बयान दिया था। यही विरोधाभासी दावे मामले की जांच को लेकर परिवार की चिंता का एक प्रमुख कारण बने हुए हैं।
CBI जांच की मांग पर अदालत का रुख
पीड़िता के पिता ने मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने सीधे CBI जांच का आदेश नहीं दिया। इसके बजाय अदालत ने पंजाब पुलिस के भीतर ही एक ऐसे वरिष्ठ अधिकारी से जांच कराने का रास्ता चुना, जो पहले मामले से जुड़ा नहीं रहा हो। साथ ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।
अदालत के इस कदम का उद्देश्य जांच की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर परिवार की चिंताओं को दूर करना था। हालांकि, परिवार का कहना है कि यदि नए अधिकारी ने अभी तक उनसे संपर्क ही नहीं किया है, तो अदालत के निर्देशों का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हो पाएगा।
राजनीतिक विवाद ने बढ़ाई संवेदनशीलता
इस मामले को लेकर पंजाब की राजनीति में भी आरोप-प्रत्यारोप हुए हैं। विपक्ष की ओर से मुख्यमंत्री की पत्नी पर मामले को दबाने के लिए कथित तौर पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया था। संबंधित पक्ष ने इन आरोपों को खारिज किया है। बाद में इन आरोपों को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी शिकायत पर संज्ञान लिया और पंजाब के मुख्य सचिव तथा DGP से मामले में जांच कर Action Taken Report देने को कहा।
हालांकि, राजनीतिक आरोपों की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। अदालत में लंबित आपराधिक जांच में आरोपों और जवाबी दावों का परीक्षण साक्ष्यों के आधार पर होना है।
अब परिवार को निष्पक्ष जांच का इंतजार
फिलहाल परिवार की मुख्य मांग यही है कि हाईकोर्ट के 20 जुलाई के निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और नया जांच अधिकारी उनसे संपर्क कर मामले की स्वतंत्र जांच शुरू करे।
अमृतसर का यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें आपराधिक आरोपों के साथ पुलिस जांच की निष्पक्षता और कथित राजनीतिक हस्तक्षेप के सवाल भी जुड़े हैं। हाईकोर्ट ने जांच की दिशा और निगरानी को लेकर स्पष्ट व्यवस्था तय की है। अब यह देखना होगा कि पंजाब पुलिस उस आदेश को किस गति और तरीके से लागू करती है।
पीड़ित परिवार के लिए सबसे बड़ा सवाल फिलहाल यही है कि अदालत के निर्देश के बाद नई जांच वास्तव में कब शुरू होगी और क्या मामले से जुड़े सभी आरोपों, बयानों और साक्ष्यों की स्वतंत्र रूप से दोबारा समीक्षा की जाएगी। जांच पूरी होने के बाद ही आरोपों की वास्तविक स्थिति और जिम्मेदारी को लेकर कानूनी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
