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9 सितंबर , 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) :  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत की लंदन के ऐतिहासिक गुरुद्वारे की यात्रा को लेकर सिख प्रवासी समुदाय के एक वर्ग के विरोध के बीच राज्यसभा सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी और ब्रिटिश-सिख कारोबारी पीटर विरदी ने उनके दौरे का बचाव किया है। दोनों ने भागवत के गुरुद्वारा जाने को धार्मिक संवाद और सद्भावना के नजरिए से देखने की अपील की है।

भागवत ने ब्रिटेन यात्रा के दौरान लंदन स्थित खालसा जथा ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारा का दौरा किया था। यह गुरुद्वारा 1908 में स्थापित हुआ था और इसे ब्रिटेन के सबसे पुराने गुरुद्वारों में से एक माना जाता है। भागवत के दौरे के दौरान उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष माथा टेका, रुमाला साहिब भेंट किया और कड़ा प्रसाद ग्रहण किया।

साहनी ने भागवत के दौरे का समर्थन करते हुए कहा कि गुरुद्वारा साहिब में आने वाले किसी भी श्रद्धालु का स्वागत किया जाना चाहिए, यदि वह श्रद्धा और विनम्रता के साथ गुरु के दरबार में आता है। उन्होंने कहा कि सिख गुरुओं की शिक्षाएं सभी के कल्याण और मानवता के प्रति खुलेपन पर जोर देती हैं।

साहनी ने सोशल मीडिया पर एक बयान में कहा कि भागवत ने गुरुद्वारे में प्रार्थना की, रुमाला साहिब चढ़ाया, कड़ा प्रसाद ग्रहण किया और गुरुद्वारा प्रबंधन के साथ सिख इतिहास तथा परंपराओं पर बातचीत की। उन्होंने इस यात्रा को संवाद के अवसर के तौर पर पेश किया।

साहनी ने यह भी कहा कि मतभेदों को विरोध या आक्रोश के बजाय बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। उन्होंने इस संदर्भ में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के श्री दरबार साहिब जाने का उदाहरण देते हुए कहा कि राजनीतिक या ऐतिहासिक मतभेदों के बावजूद धार्मिक स्थल पर श्रद्धालु के रूप में आने वाले व्यक्ति को प्रार्थना करने और सेवा करने का अवसर दिया गया था।

उन्होंने आगे कहा कि सिखों को किसी एक राजनीतिक या अलगाववादी समूह के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। साहनी ने इस बात पर जोर दिया कि सिख समुदाय ने भारत की आजादी और देश की एकता के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

विरोध क्यों हुआ?

भागवत की गुरुद्वारा यात्रा को लेकर ब्रिटेन में सिख प्रवासी समुदाय के कुछ वर्गों ने आपत्ति जताई। विरोध का संबंध RSS की विचारधारा और भारत में सिख समुदाय से जुड़े राजनीतिक तथा ऐतिहासिक मुद्दों को लेकर मौजूद मतभेदों से जोड़ा गया है।

भागवत की ब्रिटेन यात्रा पहले से ही विवाद के घेरे में थी। कुछ नागरिक समाज संगठनों ने उनके कार्यक्रमों का विरोध किया था और लंदन के मेयर सादिक खान से RSS से जुड़े कार्यक्रमों को समर्थन नहीं देने की अपील की थी।

विरोध करने वाले समूहों का कहना है कि RSS प्रमुख की यात्रा को केवल धार्मिक यात्रा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, RSS और भारत की राजनीति से जुड़े कई मुद्दों पर ब्रिटेन में सिख और अन्य दक्षिण एशियाई समुदायों के बीच गंभीर मतभेद हैं।

हालांकि, भागवत के समर्थकों का कहना है कि गुरुद्वारा सभी श्रद्धालुओं के लिए खुला धार्मिक स्थल है और किसी व्यक्ति के वहां जाने को राजनीतिक विवाद से जोड़ना उचित नहीं है।

पीटर विरदी ने भी किया समर्थन

ब्रिटिश-सिख कारोबारी और परोपकारी पीटर विरदी ने भी भागवत की गुरुद्वारा यात्रा का बचाव किया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वह उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने लंदन के गुरुद्वारे में भागवत का स्वागत किया।

विरदी ने संवाद और धार्मिक संपर्क की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका रुख यह रहा कि विभिन्न समुदायों और विचारधाराओं के लोगों के बीच बातचीत के रास्ते खुले रहने चाहिए।

भागवत की यात्रा के दौरान गुरुद्वारा प्रबंधन और सिख समुदाय के कुछ सदस्यों के साथ उनकी बातचीत को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। समर्थकों का कहना है कि धार्मिक स्थल पर मुलाकात को समुदायों के बीच संवाद बढ़ाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

साहनी ने कहा- सिख और खालिस्तानी एक नहीं

साहनी ने अपने बयान में सिख समुदाय और खालिस्तान समर्थक समूहों के बीच अंतर करने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि सिखों को खालिस्तानियों के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए और किसी अलगाववादी समूह को पूरे सिख समुदाय का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।

यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब ब्रिटेन में भारत से जुड़े राजनीतिक मुद्दों पर सिख प्रवासी संगठनों के बीच अलग-अलग विचार सामने आते रहे हैं। भारत सरकार और कुछ भारतीय नेताओं ने लंबे समय से विदेशों में सक्रिय खालिस्तान समर्थक गतिविधियों को लेकर चिंता जताई है।

लंदन में विरोध प्रदर्शन

भागवत की ब्रिटेन यात्रा के दौरान लंदन में विरोध प्रदर्शन भी हुए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने संसद के आसपास उनके कार्यक्रमों के खिलाफ प्रदर्शन किया। विरोध करने वालों ने RSS की विचारधारा और भारत में अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े मुद्दों को लेकर अपनी आपत्तियां जाहिर कीं।

दूसरी ओर, भागवत के समर्थकों और आयोजकों ने उनकी यात्रा को सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद के हिस्से के रूप में पेश किया। RSS से जुड़े संगठनों का कहना है कि विदेशों में भारतीय समुदायों के साथ संपर्क बढ़ाना उनकी गतिविधियों का हिस्सा है।

धार्मिक संवाद पर जोर

भागवत की गुरुद्वारा यात्रा ने ब्रिटेन में धर्म, राजनीति और प्रवासी समुदायों के बीच संबंधों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ विरोध करने वाले इसे राजनीतिक विचारधारा से जोड़कर देखते हैं, वहीं समर्थक इसे धार्मिक संवाद और सामुदायिक संपर्क का सामान्य अवसर मानते हैं।

साहनी ने अपने बयान में गुरु परंपरा के उस संदेश का उल्लेख किया जिसमें सभी के कल्याण और मानवता के प्रति खुलेपन की बात कही गई है। उनका कहना है कि मतभेद होने के बावजूद बातचीत के दरवाजे बंद नहीं किए जाने चाहिए।

इस पूरे विवाद में गुरुद्वारा प्रबंधन की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही, क्योंकि भागवत को गुरुद्वारे में प्रवेश और धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दी गई। समर्थकों ने इसे सिख धार्मिक परंपरा के अनुरूप बताया है।

विवाद के बीच बढ़ा राजनीतिक तापमान

भागवत की ब्रिटेन यात्रा ऐसे समय हुई है जब RSS और उसके प्रमुख की विदेश यात्राएं अक्सर राजनीतिक बहस का विषय बनती हैं। उनके कार्यक्रमों को लेकर समर्थकों और विरोधियों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं।

लंदन के गुरुद्वारे की यात्रा ने इस बहस को सिख प्रवासी समुदाय तक भी पहुंचा दिया है। एक वर्ग ने इसका विरोध किया, जबकि साहनी और विरदी जैसे प्रमुख सिख चेहरों ने भागवत के दौरे का समर्थन किया।

फिलहाल, विवाद के बावजूद भागवत की यात्रा को लेकर दोनों पक्षों के रुख में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। विरोध करने वाले समूह RSS की विचारधारा और भारत से जुड़े राजनीतिक मुद्दों पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि समर्थक धार्मिक स्वतंत्रता, संवाद और सामुदायिक सद्भाव को प्राथमिकता देने की बात कर रहे हैं।

साहनी और विरदी का समर्थन यह भी दर्शाता है कि ब्रिटिश-सिख समुदाय के भीतर इस मुद्दे पर एकराय नहीं है। आने वाले दिनों में यह विवाद ब्रिटेन में भारतीय प्रवासी राजनीति और भारत-ब्रिटेन संबंधों से जुड़े विमर्श में चर्चा का विषय बना रह सकता है।

Bharat Baani Bureau

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