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11 सितंबर, 2026 (भारत बानी ब्यूरो): आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा लोकलाइजेशन की बढ़ती जरूरतों के बीच भारत वैश्विक डेटा सेंटर उद्योग के लिए एक आकर्षक और कम लागत वाले गंतव्य के रूप में तेजी से उभर रहा है। KPMG की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त का आधार कम निर्माण लागत, अपेक्षाकृत सस्ती बिजली, प्रतिस्पर्धी प्रतिभा और तेजी से सुधरता डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर है। रिपोर्ट के अनुसार, यही कारक भारत को आने वाले वर्षों में वैश्विक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का महत्वपूर्ण केंद्र बना सकते हैं।

मुंबई की लागत में बड़ा अंतर

भारत के डेटा सेंटर बाजार का सबसे बड़ा केंद्र मुंबई है। यह देश की वित्तीय राजधानी होने के साथ-साथ डेटा सेंटर गतिविधियों के लिहाज से भी सबसे महत्वपूर्ण बाजार बन चुका है। CBRE के अनुसार मुंबई में लगभग 670 मेगावाट डेटा सेंटर क्षमता है और क्लाउड, BFSI तथा बड़ी टेक कंपनियों की मांग के कारण बाजार लगातार विस्तार कर रहा है।

निर्माण लागत की तुलना भारत के पक्ष में महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करती है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र के डेटा सेंटर निर्माण लागत के उपलब्ध बेंचमार्क में मुंबई के प्रमुख क्लस्टरों की लागत सिंगापुर और टोक्यो के प्रमुख बाजारों से काफी नीचे है। Cushman & Wakefield के 2025 डेटा के अनुसार मुंबई के Powai क्षेत्र में मध्यम निर्माण लागत करीब 3,151 डॉलर प्रति वर्गमीटर थी, जबकि सिंगापुर के Paya Lebar में यह करीब 2,170 डॉलर और टोक्यो के Central Tokyo में करीब 11,278 डॉलर प्रति वर्गमीटर थी—हालांकि अलग-अलग लोकेशन, डिजाइन और स्पेसिफिकेशन के कारण सीधे तुलना में सावधानी जरूरी है।

दूसरे वैश्विक बेंचमार्क भी बताते हैं कि टोक्यो और सिंगापुर जैसे स्थापित डेटा सेंटर बाजारों में भूमि, निर्माण और श्रम की लागत भारत की तुलना में अधिक है। Turner & Townsend के 2025 इंडेक्स में टोक्यो की डेटा सेंटर निर्माण लागत 15.2 डॉलर प्रति वाट और सिंगापुर की 14.5 डॉलर प्रति वाट बताई गई थी, जिससे ये दुनिया के सबसे महंगे बाजारों में शामिल रहे।

भारत की लागत बढ़त क्यों महत्वपूर्ण है?

डेटा सेंटर केवल सर्वर रखने वाली इमारत नहीं है। इसके निर्माण में भूमि, बिजली, कूलिंग, नेटवर्क कनेक्टिविटी, बैकअप पावर, सुरक्षा और अत्याधुनिक इंजीनियरिंग पर भारी निवेश होता है। इसलिए निर्माण और संचालन लागत में मामूली अंतर भी हजारों करोड़ रुपये की बड़ी परियोजनाओं में महत्वपूर्ण हो जाता है।

KPMG के अनुसार भारत को कम निर्माण लागत के साथ-साथ cost-efficient power, प्रतिस्पर्धी टैलेंट बेस, बेहतर कनेक्टिविटी, जमीन की उपलब्धता और विकसित हो रहे सप्लायर इकोसिस्टम का लाभ मिल रहा है। नीति समर्थन और निवेश को आसान बनाने वाले सुधार भी इस प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को मजबूत कर रहे हैं।

AI ने बढ़ाई डेटा सेंटर की मांग

भारत के डेटा सेंटर बाजार में अगला बड़ा बदलाव AI के कारण हो रहा है। Generative AI और high-performance computing के लिए पारंपरिक डेटा सेंटर की तुलना में कहीं अधिक कंप्यूटिंग क्षमता, बिजली और कूलिंग की जरूरत होती है।

KPMG के मुताबिक AI workloads डेटा सेंटर के डिजाइन को बदल रहे हैं। ज्यादा power density, liquid cooling, उच्च क्षमता वाले GPU और अधिक resilient infrastructure की जरूरत बढ़ रही है। इसका अर्थ यह है कि भविष्य के डेटा सेंटर केवल बड़े नहीं होंगे, बल्कि अधिक तकनीकी रूप से जटिल और ऊर्जा-कुशल भी होंगे।

KPMG के मई 2026 के एक अन्य अध्ययन के मुताबिक भारत का AI-optimised data centre बाजार 2024 में लगभग 588.6 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2030 तक करीब 3.55 अरब डॉलर हो सकता है, जो 35.1 प्रतिशत CAGR के बराबर है।

2030 तक क्षमता में बड़ा विस्तार

भारत का डेटा सेंटर सेक्टर अभी शुरुआती चरण से निकलकर बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार में बदल रहा है। KPMG के अनुसार 2026 की शुरुआत में भारत में 150 से अधिक डेटा सेंटर और लगभग 1.5 GW की operational capacity थी। यह क्षमता 2026 के अंत तक 1.8 GW से अधिक और 2030 तक 8 GW से ज्यादा पहुंचने की संभावना जताई गई है।

इस विस्तार में मुंबई के साथ चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलुरु और दिल्ली-NCR जैसे बाजारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। हालांकि मुंबई अपनी मजबूत फाइबर कनेक्टिविटी, वित्तीय क्षेत्र की मांग और मौजूदा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण सबसे महत्वपूर्ण हब बना हुआ है।

डेटा लोकलाइजेशन से मिला अतिरिक्त फायदा

भारत में डेटा सेंटर की मांग सिर्फ AI और क्लाउड से नहीं बढ़ रही। डेटा लोकलाइजेशन और डेटा सुरक्षा से जुड़े नियम भी कंपनियों को देश के भीतर डेटा स्टोर और प्रोसेस करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।

KPMG के अनुसार cloud adoption, data localisation, BFSI digitisation और 5G-enabled edge computing भारत में डेटा सेंटर की मांग के प्रमुख structural drivers हैं।

इसका असर खासतौर पर बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, ई-कॉमर्स, डिजिटल पेमेंट, सरकारी सेवाओं और एंटरप्राइज टेक्नोलॉजी पर दिखाई दे रहा है।

निवेश का बड़ा अवसर

KPMG ने भारत के पूरे डेटा सेंटर value chain में FY35 तक करीब 90 अरब डॉलर के अवसर का अनुमान लगाया है। यह अवसर केवल डेटा सेंटर भवनों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पावर, कूलिंग, नेटवर्क, निर्माण, सुरक्षा, फाइबर, ऑपरेशंस और अन्य ancillary services तक फैलेगा।

इससे भारतीय इंजीनियरिंग और निर्माण कंपनियों के साथ-साथ बिजली, renewable energy, cooling technology और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए भी नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

चुनौती भी कम नहीं

हालांकि भारत की लागत बढ़त मजबूत है, लेकिन तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर बाजार के सामने चुनौतियां भी हैं। बिजली की लगातार उपलब्धता, पानी और कूलिंग की जरूरत, जमीन की कीमत, पर्यावरणीय मानक, कुशल तकनीकी कर्मचारियों की उपलब्धता और निर्माण की गति महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

KPMG ने भी AI-ready infrastructure के लिए advanced cooling और high-density power frameworks की जरूरत पर जोर दिया है। बढ़ते AI workloads के साथ ऊर्जा की मांग भी बढ़ेगी, इसलिए renewable energy और efficient cooling को भविष्य की परियोजनाओं में अधिक महत्व देना होगा।

भारत के लिए रणनीतिक मौका

डेटा सेंटर अब सिर्फ टेक्नोलॉजी कंपनियों की जरूरत नहीं रहे। ये डिजिटल अर्थव्यवस्था की बुनियादी संरचना का हिस्सा बन चुके हैं। बैंकिंग से लेकर AI, सरकारी सेवाओं से लेकर ई-कॉमर्स और cloud computing तक लगभग हर डिजिटल गतिविधि इनके ऊपर निर्भर है।

ऐसे समय में यदि भारत कम निर्माण लागत, अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी बिजली और प्रतिभा, मजबूत घरेलू डिजिटल मांग तथा नीति समर्थन को एक साथ इस्तेमाल करता है, तो वह केवल घरेलू डेटा सेंटर बाजार का विस्तार नहीं कर सकता, बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में वैश्विक कंपनियों के लिए एक प्रमुख डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बेस भी बन सकता है।

मुंबई पहले ही इस बदलाव का केंद्र बन चुका है। आने वाले वर्षों में AI और cloud-driven demand के साथ भारत की लागत बढ़त अगर बिजली, कनेक्टिविटी और sustainability की चुनौतियों के साथ संतुलित रहती है, तो देश का डेटा सेंटर उद्योग वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में एक नई रणनीतिक भूमिका निभा सकता है।

Bharat Baani Bureau

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