17 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो)। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच भारत में इस साल जून से अगस्त के दौरान करीब 11.7 करोड़ लोग कम से कम 30 दिनों तक जोखिम वाली गर्मी के संपर्क में रहे। अमेरिका स्थित गैर-लाभकारी संस्था Climate Central के नए विश्लेषण के अनुसार, इस अवधि में जलवायु परिवर्तन से प्रभावित जोखिम वाली गर्मी का सामना करने वाली आबादी के मामले में भारत दुनिया में सबसे आगे रहा।
Climate Central ने ‘Risky Heat Added by Climate Change: June to August 2026’ नाम से यह विश्लेषण जारी किया है। इसमें दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में तापमान पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और उससे जुड़ी गर्मी के जोखिम का आकलन किया गया है।
जोखिम वाली गर्मी से क्या मतलब है?
विश्लेषण में ‘रिस्की हीट’ यानी जोखिम वाली गर्मी को उन दिनों के रूप में परिभाषित किया गया है जब किसी स्थानीय क्षेत्र का तापमान वहां 1991-2020 की अवधि में दर्ज किए गए तापमान के 90 प्रतिशत से अधिक रहा। Climate Central के मुताबिक, यह वह स्तर है जहां गर्मी से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम बढ़ने लगते हैं।
विश्लेषण में केवल सामान्य रूप से गर्म दिनों को नहीं देखा गया, बल्कि यह भी आकलन किया गया कि जलवायु परिवर्तन ने किसी दिन के तापमान के असामान्य रूप से अधिक होने की संभावना को कितना बढ़ाया।
भारत में औसत व्यक्ति ने 39 दिन महसूस किया जलवायु प्रभाव
Climate Central के अनुसार, जून से अगस्त 2026 के दौरान भारत में औसत व्यक्ति ने लगभग 39 दिन ऐसे तापमान का सामना किया जो जलवायु परिवर्तन से काफी प्रभावित था।
इसी अवधि में भारत का औसत तापमान 1991-2020 के सामान्य औसत से लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। यह आंकड़ा देश में गर्मी के बढ़ते प्रभाव और लंबे समय तक बने रहने वाले तापमान जोखिम की ओर संकेत करता है।
श्रीनगर में सबसे ज्यादा जोखिम वाले दिन
Climate Central के विश्लेषण में भारत के कई शहरों में जोखिम वाली गर्मी के दिनों का उल्लेख किया गया है। श्रीनगर में 53 दिन ऐसे दर्ज किए गए, जो सूची में सबसे अधिक थे।
इसके बाद चेन्नई में 40 दिन, जबकि राजकोट और अमृतसर में 29-29 दिन तथा लखनऊ में 27 दिन जोखिम वाली गर्मी वाले दिन दर्ज किए गए।
विश्लेषण के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से विशेष रूप से प्रभावित दिनों की संख्या भी कई शहरों में उल्लेखनीय रही। चेन्नई में 30 दिन, श्रीनगर और तिरुचिरापल्ली में 29-29 दिन तथा मदुरै में 23 दिन ऐसे रहे जिनमें जलवायु परिवर्तन का महत्वपूर्ण प्रभाव आंका गया।
मुंबई में 86 दिन तापमान पर मजबूत जलवायु प्रभाव
मुंबई में इस अवधि के दौरान 86 दिन ऐसे रहे जब तापमान पर जलवायु परिवर्तन का मजबूत प्रभाव देखा गया। Climate Central के Climate Shift Index के आधार पर ऐसे दिनों का मतलब है कि संबंधित तापमान पहले की तुलना में कम से कम दोगुना संभावित हो गया था।
यह आंकड़ा यह भी दिखाता है कि जोखिम केवल उन क्षेत्रों तक सीमित नहीं है जहां पारंपरिक रूप से अत्यधिक गर्मी देखी जाती है। बड़े शहरी क्षेत्रों में भी जलवायु परिवर्तन तापमान के पैटर्न को प्रभावित कर रहा है।
दुनिया में 1.5 अरब से ज्यादा लोग प्रभावित
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं रही। Climate Central के अनुसार, जून से अगस्त के बीच दुनिया भर में 1.5 अरब से अधिक लोग कम से कम 30 दिनों तक जलवायु परिवर्तन से काफी प्रभावित जोखिम वाली गर्मी के संपर्क में रहे।
एशिया में यह प्रभाव सबसे बड़ा रहा। महाद्वीप की करीब 2.8 अरब आबादी, यानी लगभग 58 प्रतिशत लोग, कम से कम 30 दिनों की जोखिम वाली गर्मी के संपर्क में आए।
भारत के बाद चीन में करीब 9.4 करोड़ और इंडोनेशिया में करीब 8.3 करोड़ लोग इस श्रेणी में रहे।
स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा
अत्यधिक गर्मी का लंबे समय तक बने रहना मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती माना जाता है। गर्मी से निर्जलीकरण, हीट स्ट्रेस और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है, विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों, खुले में काम करने वाले लोगों और पहले से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं वाले लोगों में।
Climate Central के निष्कर्ष ऐसे समय सामने आए हैं जब दुनिया के कई हिस्सों में गर्मी की अवधि और तीव्रता को लेकर चिंता बढ़ रही है। विश्लेषण के अनुसार, किसी भी दिन इस गर्मी के मौसम में दुनिया की एक चौथाई से अधिक आबादी ने स्थानीय तापमान पर जलवायु परिवर्तन का मजबूत प्रभाव महसूस किया।
विश्लेषण में यह भी कहा गया कि जीवाश्म ईंधन के जलने से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तापमान वृद्धि और गर्मी की घटनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारत के लिए 11.7 करोड़ लोगों का यह आंकड़ा इस बात को रेखांकित करता है कि गर्मी से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों के लिए स्थानीय स्तर पर तैयारी, शहरी गर्मी प्रबंधन और कमजोर आबादी की सुरक्षा पर लगातार ध्यान देने की जरूरत है।
