22 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो)। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण भारत का क्रूड ऑयल आयात बिल चालू वित्त वर्ष 2026-27 के पहले पांच महीनों, यानी अप्रैल से अगस्त के दौरान, 48.4 प्रतिशत बढ़कर 74.8 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार, आयात की मात्रा लगभग स्थिर रहने के बावजूद वैश्विक कीमतों में तेजी ने भारत के ऊर्जा आयात खर्च को काफी बढ़ा दिया। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search1”]}/>
आयात की मात्रा में मामूली गिरावट
PPAC के आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने अप्रैल-अगस्त 2026 के दौरान करीब 100.7 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) कच्चे तेल का आयात किया। पिछले वर्ष की समान अवधि में यह मात्रा 101.1 मिलियन मीट्रिक टन थी। इस तरह आयात की मात्रा में केवल 0.4 प्रतिशत की कमी आई, जबकि आयात बिल में 48.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
इससे संकेत मिलता है कि आयात खर्च में बढ़ोतरी का मुख्य कारण खरीदे गए तेल की मात्रा नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों का ऊंचा होना था। भारत ने इस अवधि में कच्चे तेल पर पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 24.4 अरब डॉलर अधिक खर्च किए। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search1”]}/>
अगस्त में भी आयात खर्च बढ़ा
अगस्त 2026 में भारत का कच्चे तेल का आयात बिल सालाना आधार पर लगभग 18 प्रतिशत बढ़कर 11.7 अरब डॉलर हो गया। इस दौरान आयात की मात्रा करीब 3 प्रतिशत घटकर 19 मिलियन टन रही।
PPAC के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत 90.19 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि अगस्त 2025 में यह 69.11 डॉलर प्रति बैरल थी। यानी एक वर्ष में औसत कीमत में लगभग 30.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जुलाई 2026 में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत 82.04 डॉलर प्रति बैरल थी। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search2”]}/>
पश्चिम एशिया के तनाव से कीमतों पर दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के पीछे पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं को प्रमुख कारण माना जा रहा है। क्षेत्र में संघर्ष, महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों पर जोखिम और खाड़ी क्षेत्र से निर्यात को लेकर अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ाया है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन मार्गों में से एक है। इस मार्ग से संबंधित किसी भी व्यवधान की आशंका से तेल की आपूर्ति और शिपिंग लागत को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं। सितंबर में भारतीय क्रूड बास्केट की कीमतों में भी तेज उछाल दर्ज किया गया। PPAC के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत 2 सितंबर के 99.35 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 18 सितंबर को 123.86 डॉलर प्रति बैरल हो गई। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search2”]}/>
भारत की आयात निर्भरता बनी चुनौती
भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। अप्रैल-अगस्त 2026 के दौरान देश की क्रूड आयात निर्भरता 88.1 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 88.3 प्रतिशत थी।
घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन भी इस अवधि में घटकर 11.4 मिलियन मीट्रिक टन रह गया, जो पिछले वर्ष 11.9 मिलियन मीट्रिक टन था। इससे भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में विदेशी आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कीमतों का महत्व बना हुआ है। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search1”]}/>
भारत दुनिया के प्रमुख कच्चे तेल आयातक देशों में शामिल है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर देश के आयात बिल, विदेशी मुद्रा की मांग और बाहरी क्षेत्र के संतुलन पर पड़ सकता है।
कुल तेल और गैस आयात खर्च में भी वृद्धि
कच्चे तेल के अलावा तेल और गैस से जुड़े कुल आयात खर्च में भी बढ़ोतरी हुई है। अप्रैल-अगस्त 2026 के दौरान भारत का शुद्ध तेल और गैस आयात बिल 34.7 प्रतिशत बढ़कर 66.8 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 49.6 अरब डॉलर था।
इसी अवधि में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों सहित सकल पेट्रोलियम आयात 36.8 प्रतिशत बढ़कर 81.8 अरब डॉलर हो गया। भारत के कुल माल आयात में पेट्रोलियम आयात की हिस्सेदारी भी बढ़कर 22.5 प्रतिशत हो गई, जबकि पिछले वर्ष यह 19.5 प्रतिशत थी। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search1”]}/>
व्यापार घाटे पर पड़ सकता है असर
ऊर्जा आयात पर बढ़ता खर्च भारत के व्यापार संतुलन को प्रभावित कर सकता है। अप्रैल-अगस्त 2026 के दौरान देश का व्यापारिक घाटा 147.1 अरब डॉलर रहा, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 123.9 अरब डॉलर था।
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो आयात भुगतान बढ़ सकता है। इससे चालू खाते के घाटे और रुपये की विनिमय दर पर दबाव पड़ने की संभावना रहती है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव तेल की कीमतों, आयात मात्रा, पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात, विनिमय दर और वैश्विक व्यापार परिस्थितियों सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search1”]}/>
पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून 2026 में भारत का चालू खाते का घाटा 4.2 अरब डॉलर या GDP का 0.5 प्रतिशत रहा, जबकि पिछले वर्ष की समान तिमाही में यह 3.4 अरब डॉलर या GDP का 0.4 प्रतिशत था। <Cite refs={[“turn0search0”]}/>
महंगाई और आर्थिक वृद्धि पर संभावित प्रभाव
महंगे कच्चे तेल का असर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। परिवहन, विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, विमानन और पेट्रोकेमिकल उद्योगों की लागत बढ़ने की संभावना रहती है। यदि कंपनियां बढ़ी हुई लागत का हिस्सा उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं, तो वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
अगस्त 2026 में भारत की थोक महंगाई 9.92 प्रतिशत रही। इस दौरान ईंधन और बिजली श्रेणी में कीमतों की वृद्धि उल्लेखनीय रही, जिससे उत्पादन लागत पर दबाव का संकेत मिलता है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों और खुदरा महंगाई के बीच संबंध कई अन्य कारकों—जैसे सरकारी कर, घरेलू ईंधन मूल्य निर्धारण, रुपये की विनिमय दर और कंपनियों की लागत वहन करने की क्षमता—पर भी निर्भर करता है। <Cite refs={[“turn0news21″,”turn0search2”]}/>
सितंबर में कीमतों की तेजी से बढ़ी चिंता
अगस्त की औसत कीमतों के मुकाबले सितंबर में भारतीय क्रूड बास्केट और अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अधिक तेजी देखी गई। सितंबर के मध्य में भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थी।
हालांकि 22 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कुछ नरमी देखी गई, लेकिन Brent crude 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहा। बाजार में कीमतों की दिशा पश्चिम एशिया के घटनाक्रम, आपूर्ति मार्गों की स्थिति और संभावित कूटनीतिक प्रयासों पर निर्भर कर सकती है। <Cite refs={[“turn0search2″,”turn0news14”]}/>
ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ता ध्यान
आयात बिल में तेज वृद्धि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति स्रोतों में विविधता बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करती है। भारत विभिन्न देशों से कच्चा तेल खरीदता है, जिससे किसी एक आपूर्तिकर्ता या क्षेत्र पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जाता है। फिर भी वैश्विक कीमतों में व्यापक तेजी का असर आयात लागत पर पड़ सकता है।
दीर्घकालिक रूप से घरेलू उत्पादन, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, ऊर्जा दक्षता और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार जैसे उपाय आयात जोखिम को कम करने में भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, भारत की मौजूदा ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए कच्चे तेल का आयात निकट अवधि में महत्वपूर्ण बना रहेगा।
आगे बाजार की नजर किन कारकों पर
आने वाले महीनों में भारत के ऊर्जा आयात बिल की दिशा मुख्य रूप से पांच कारकों से प्रभावित हो सकती है:
- अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें।
- पश्चिम एशिया में संघर्ष और आपूर्ति मार्गों की स्थिति।
- रुपये और अमेरिकी डॉलर की विनिमय दर।
- भारत की घरेलू तेल मांग और आयात मात्रा।
- पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात और घरेलू ईंधन मूल्य निर्धारण की स्थिति।
अप्रैल-अगस्त के आंकड़े यह दिखाते हैं कि आयात की मात्रा में मामूली बदलाव के बावजूद कीमतों में तेज बढ़ोतरी भारत के ऊर्जा खर्च को काफी प्रभावित कर सकती है। यदि वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर देश के व्यापार घाटे, महंगाई और आर्थिक नीति पर भी दिखाई दे सकता है।
