2 नवंबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो) : मानव शरीर का सामान्य तापमान आमतौर पर लगभग 37 डिग्री सेल्सियस माना जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह मान हमेशा से एक जैसा नहीं रहा होगा। एक नए वैज्ञानिक विचार के मुताबिक, हमारे अपेक्षाकृत हाल के पूर्वजों के शरीर का तापमान आज के मनुष्यों की तुलना में अधिक हो सकता था। यह सवाल अब शोधकर्ताओं के लिए दिलचस्प विषय बन गया है कि आखिर समय के साथ मानव शरीर का तापमान क्यों बदला और इसके पीछे कौन-से जैविक तथा पर्यावरणीय कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।
शरीर का तापमान मानव स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। यह शरीर में होने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं, मांसपेशियों के कामकाज, प्रतिरक्षा प्रणाली और मस्तिष्क की गतिविधियों से जुड़ा होता है। शरीर तापमान को नियंत्रित रखने के लिए पसीना निकालने, त्वचा की रक्त वाहिकाओं को फैलाने या सिकोड़ने और ऊर्जा उत्पादन जैसी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करता है।
क्या पहले इंसानों का तापमान अधिक था?
वैज्ञानिकों के सामने यह समझने की चुनौती है कि हजारों साल पहले जीवित रहे लोगों के शरीर का वास्तविक तापमान क्या था। प्राचीन मनुष्यों के शरीर का तापमान सीधे मापने का कोई तरीका नहीं है। इसलिए शोधकर्ता ऐतिहासिक चिकित्सा रिकॉर्ड, उपलब्ध जैविक नमूनों और आधुनिक आबादी के तापमान संबंधी आंकड़ों की तुलना करते हैं।
अमेरिका में किए गए एक चर्चित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 19वीं सदी के मध्य से लेकर आधुनिक समय तक शरीर के तापमान के आंकड़ों का विश्लेषण किया था। इस अध्ययन में पाया गया कि औसत शरीर का तापमान धीरे-धीरे कम हुआ है। इससे यह संभावना सामने आई कि मानव शरीर का तापमान समय के साथ बदल सकता है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति या हर आबादी का तापमान एक समान तरीके से घटा है। शरीर का तापमान उम्र, लिंग, दिन के समय, शारीरिक गतिविधि, हार्मोन और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार भी बदलता है।
जीवनशैली और स्वास्थ्य में बदलाव हो सकते हैं वजह
शोधकर्ताओं के अनुसार, शरीर के औसत तापमान में बदलाव के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक जीवनशैली और स्वास्थ्य सुविधाओं में आया परिवर्तन है।
पहले के समय में संक्रामक बीमारियां, परजीवी संक्रमण और सूजन संबंधी समस्याएं अधिक आम थीं। संक्रमण के दौरान शरीर का तापमान बढ़ सकता है, क्योंकि बुखार प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया का हिस्सा होता है। आधुनिक चिकित्सा, बेहतर स्वच्छता, टीकाकरण और संक्रमण के इलाज की सुविधाओं ने कई समाजों में बीमारियों का बोझ कम किया है। इससे आबादी के औसत तापमान पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जाती है।
इसके अलावा, आधुनिक घरों और कार्यस्थलों में तापमान नियंत्रित रखने की सुविधाएं उपलब्ध हैं। हीटिंग और एयर कंडीशनिंग के कारण लोगों को अत्यधिक गर्मी या ठंड का सामना पहले की तुलना में कम करना पड़ता है। इससे शरीर को तापमान नियंत्रित करने के लिए अलग तरह से काम करना पड़ सकता है।
मेटाबॉलिज्म की भूमिका भी अहम
शरीर का तापमान मेटाबॉलिज्म यानी चयापचय से भी जुड़ा है। शरीर भोजन को ऊर्जा में बदलता है और इस प्रक्रिया के दौरान गर्मी पैदा होती है। मेटाबॉलिज्म की दर, शारीरिक गतिविधि, मांसपेशियों की मात्रा और हार्मोन शरीर में पैदा होने वाली गर्मी को प्रभावित कर सकते हैं।
यदि समय के साथ लोगों की औसत शारीरिक गतिविधि, खानपान और स्वास्थ्य में बदलाव आया है, तो इसका असर शरीर के तापमान पर भी पड़ सकता है। हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि केवल कम शारीरिक गतिविधि या आधुनिक सुविधाएं ही तापमान में गिरावट की वजह हैं।
क्या यह विकास की प्रक्रिया का हिस्सा है?
मानव शरीर हजारों वर्षों में पर्यावरण, भोजन, बीमारियों और जीवनशैली के अनुसार विकसित हुआ है। वैज्ञानिक इस बात की जांच कर रहे हैं कि शरीर के तापमान में बदलाव केवल बाहरी परिस्थितियों का परिणाम है या इसके पीछे आनुवंशिक और विकासवादी बदलाव भी हैं।
यह शोध मानव विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इससे यह भी पता चल सकता है कि शरीर ऊर्जा का इस्तेमाल कैसे करता है और अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों में तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता किस तरह बदलती है।
फिलहाल वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ऐतिहासिक आंकड़ों की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए शरीर के तापमान में आए बदलावों के वास्तविक कारणों को अलग-अलग पहचाना जाए। इतना जरूर स्पष्ट है कि 37 डिग्री सेल्सियस को हर इंसान के लिए एक अपरिवर्तनीय सामान्य तापमान मानना सही नहीं है। मानव शरीर का सामान्य तापमान एक सीमा में बदल सकता है और समय के साथ आबादी का औसत भी बदल सकता है।
