3 नवंबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो) : आमतौर पर स्वस्थ वयस्कों को रोजाना कम से कम सात घंटे की नींद लेने की सलाह दी जाती है। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो केवल चार से छह घंटे सोने के बाद भी खुद को तरोताजा, सक्रिय और ऊर्जावान महसूस करते हैं। इन्हें वैज्ञानिक भाषा में नेचुरल शॉर्ट स्लीपर्स (Natural Short Sleepers) कहा जाता है। वैज्ञानिकों के लिए ये लोग लंबे समय से शोध का विषय बने हुए हैं, क्योंकि इनका शरीर कम नींद में भी सामान्य रूप से काम करता दिखाई देता है।
हाल ही में प्रकाशित वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्टों में इस दुर्लभ क्षमता के पीछे आनुवंशिक कारणों पर चर्चा की गई है। शोधकर्ताओं का मानना है कि कुछ लोगों में ऐसे जीन संबंधी बदलाव हो सकते हैं जो नींद और जागने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। हालांकि, यह क्षमता बहुत कम लोगों में पाई जाती है और इसे सामान्य आदत या कम सोने की ट्रेनिंग से हासिल नहीं किया जा सकता।
कौन होते हैं नेचुरल शॉर्ट स्लीपर्स?
नेचुरल शॉर्ट स्लीपर्स वे लोग होते हैं जिन्हें बचपन या शुरुआती वयस्क जीवन से ही सामान्य लोगों की तुलना में कम नींद की जरूरत महसूस होती है। वे बिना अलार्म के स्वाभाविक रूप से जल्दी जाग जाते हैं और दिनभर सक्रिय रहते हैं। छुट्टी के दिनों या लंबी यात्रा के दौरान भी उनकी नींद की अवधि में बहुत अधिक बदलाव नहीं आता।
इस समूह की एक खास पहचान यह है कि उन्हें कम सोने के बावजूद दिन में लगातार थकान, उनींदापन या ध्यान केंद्रित करने में परेशानी महसूस नहीं होती। यह स्थिति उन लोगों से अलग है जो काम, तनाव या व्यस्त दिनचर्या के कारण अपनी नींद कम कर देते हैं। ऐसे लोगों को भले ही शुरुआत में कोई परेशानी न दिखे, लेकिन लंबे समय तक नींद की कमी स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
जीन में बदलाव हो सकता है प्रमुख कारण
वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे जीन की पहचान की है जिनका संबंध प्राकृतिक रूप से कम नींद लेने की क्षमता से हो सकता है। इनमें DEC2 यानी BHLHE41, ADRB1, NPSR1 और GRM1 जैसे जीन शामिल हैं। इन जीनों में दुर्लभ बदलाव नींद-जागने की प्रक्रिया और मस्तिष्क की सक्रियता को प्रभावित कर सकते हैं।
वर्ष 2009 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन फ्रांसिस्को के शोधकर्ताओं ने DEC2 जीन में एक बदलाव की पहचान की थी। यह बदलाव ऐसे परिवार के सदस्यों में पाया गया जो सामान्य से कम सोते थे, लेकिन दिन में सक्रिय और स्वस्थ दिखाई देते थे। बाद के अध्ययनों में ADRB1 और अन्य जीनों से जुड़े बदलावों पर भी शोध किया गया। वैज्ञानिक इन निष्कर्षों के आधार पर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि कुछ लोगों का मस्तिष्क कम नींद में अपनी जरूरतें कैसे पूरी करता है।
क्या चार घंटे की नींद सभी के लिए पर्याप्त है?
इसका जवाब स्पष्ट रूप से नहीं है। नेचुरल शॉर्ट स्लीपर्स एक दुर्लभ अपवाद हैं। अधिकांश वयस्कों को बेहतर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए नियमित रूप से कम से कम सात घंटे की नींद की जरूरत होती है। पर्याप्त नींद याददाश्त, सीखने की क्षमता, भावनात्मक संतुलन, प्रतिरक्षा प्रणाली और शरीर की मरम्मत जैसी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कम नींद लेने की आदत को प्राकृतिक क्षमता समझना खतरनाक हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति चार या पांच घंटे सोकर भी काम कर रहा है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसका शरीर पूरी तरह आराम कर चुका है। लगातार नींद की कमी से एकाग्रता, प्रतिक्रिया देने की गति और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। लंबे समय तक अपर्याप्त नींद का संबंध कई स्वास्थ्य समस्याओं से भी पाया गया है।
वैज्ञानिक शोध में अभी कई सवाल बाकी
प्राकृतिक रूप से कम सोने वाले लोगों पर हुए शोध से नींद के जैविक आधार को समझने में मदद मिल रही है। हालांकि, वैज्ञानिक अभी यह पूरी तरह नहीं जानते कि इन लोगों में कम नींद का दीर्घकालिक प्रभाव क्या होता है। वर्ष 2022 में प्रकाशित एक जनसंख्या-आधारित अध्ययन में पहले से बताए गए कुछ जीन वेरिएंट रखने वाले लोगों में सामान्य से कम नींद लेने का स्पष्ट संबंध नहीं मिला। इससे पता चलता है कि केवल किसी एक जीन में बदलाव को कम नींद की क्षमता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
शोधकर्ताओं के सामने यह भी सवाल है कि क्या प्राकृतिक रूप से कम सोने वाले लोगों में उम्र बढ़ने, हृदय स्वास्थ्य और मानसिक क्षमता पर लंबे समय में कोई प्रभाव पड़ता है। इसके लिए बड़े और लंबे समय तक चलने वाले अध्ययनों की जरूरत है।
कम सोने की कोशिश न करें
विशेषज्ञों के अनुसार, कम नींद को उत्पादकता या सफलता का पैमाना नहीं बनाना चाहिए। हर व्यक्ति की नींद की जरूरत अलग हो सकती है, लेकिन अधिकांश लोगों के लिए पर्याप्त और नियमित नींद बेहद जरूरी है। यदि कोई व्यक्ति लगातार थकान, दिन में नींद आने या रात में सोने में परेशानी का अनुभव करता है, तो उसे अपनी दिनचर्या सुधारने के साथ जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
नेचुरल शॉर्ट स्लीपर्स का मामला विज्ञान के लिए दिलचस्प जरूर है, लेकिन यह आम लोगों के लिए चार घंटे सोने का संदेश नहीं है। फिलहाल वैज्ञानिकों का जोर इस बात को समझने पर है कि कुछ दुर्लभ लोगों का शरीर कम नींद में कैसे काम करता है और इससे भविष्य में नींद से जुड़ी समस्याओं के इलाज के लिए क्या नई जानकारी मिल सकती है।
