4 सितंबर , 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : ईरान के खिलाफ अमेरिका की आर्थिक घेराबंदी के अभियान को लेकर एक बड़ा कूटनीतिक दावा सामने आया है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि चीन ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के अमेरिकी प्रयासों में सहयोग करने के लिए तैयार है। वेंस के मुताबिक, बीजिंग तेहरान की तुलना में अधिक “जिम्मेदार” व्यवहार कर रहा है और अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर सहयोग की संभावना मौजूद है।
वेंस की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन ईरान पर सैन्य दबाव के साथ-साथ अभूतपूर्व आर्थिक दबाव बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। वॉशिंगटन पहले ही ईरान के खिलाफ व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों और वित्तीय दबाव की नीति को तेज कर चुका है और दूसरे देशों से भी ईरान के साथ आर्थिक संबंध सीमित करने की अपील कर रहा है।
वेंस का चीन को लेकर बड़ा दावा
वेंस ने कहा कि चीन अमेरिका की ईरान नीति के संदर्भ में “बातचीत के लिए तैयार” है। उन्होंने संकेत दिया कि बीजिंग के साथ इस मुद्दे पर बातचीत हो रही है और चीन ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के प्रयास में कुछ स्तर तक सहयोग कर सकता है।
अमेरिकी प्रशासन के लिए चीन का संभावित सहयोग महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में से एक रहा है। ऐसे में यदि बीजिंग ईरान से जुड़े तेल कारोबार, वित्तीय लेनदेन या अन्य आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिबंधों के अनुरूप कदम उठाता है तो अमेरिकी अभियान का असर काफी व्यापक हो सकता है।
हालांकि, वेंस के बयान को चीन की ओर से किसी औपचारिक घोषणा के बराबर नहीं माना जा सकता। बीजिंग ने इससे पहले अमेरिकी प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव की नीति की आलोचना की है।
चीन पहले भी कर चुका है अमेरिकी दबाव का विरोध
अगस्त में जब अमेरिका ने ईरान की अर्थव्यवस्था को व्यापक रूप से निशाना बनाने की घोषणा की थी, तब चीन ने स्पष्ट रूप से कहा था कि प्रतिबंध और दबाव पश्चिम एशिया के विवाद का समाधान नहीं कर सकते।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा था कि प्रतिबंध और दबाव समस्या का समाधान नहीं करेंगे तथा संबंधित पक्षों को राजनीतिक और कूटनीतिक माध्यमों से समाधान तलाशना चाहिए।
इसलिए वेंस का नया बयान और चीन का पहले का आधिकारिक रुख पूरी तरह एक जैसा नहीं दिखाई देता। संभव है कि अमेरिका और चीन के बीच पर्दे के पीछे कुछ व्यावहारिक बातचीत चल रही हो, लेकिन सार्वजनिक रूप से बीजिंग ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक दबाव का खुला समर्थन नहीं किया है।
ट्रंप प्रशासन का ‘Economic D-Day’
ईरान के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक रणनीति को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने “Economic D-Day” और अभूतपूर्व आर्थिक युद्ध के रूप में पेश किया है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि जो देश या संस्थाएं ईरान को वित्तीय, कारोबारी या अन्य आर्थिक “lifeline” उपलब्ध कराएंगी, उन्हें भी अमेरिकी आर्थिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिकी प्रशासन का उद्देश्य ईरान की उन आर्थिक गतिविधियों को कमजोर करना है जिनसे सरकार को विदेशी मुद्रा और राजस्व मिलता है। इसमें तेल कारोबार, शिपिंग, वित्तीय लेनदेन, फ्रंट कंपनियों और कथित प्रतिबंध-परिहार नेटवर्क पर दबाव बढ़ाना शामिल है।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट भी पहले कह चुके हैं कि वॉशिंगटन ईरान को वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग-थलग करने के लिए सहयोगियों और अन्य देशों को साथ लाने की कोशिश कर रहा है।
चीन की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?
चीन की भूमिका इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान के साथ उसके आर्थिक संबंध अमेरिका की रणनीति के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं। यदि चीन ईरानी तेल या अन्य प्रमुख आर्थिक गतिविधियों से दूरी बनाता है, तो तेहरान पर आर्थिक दबाव काफी बढ़ सकता है।
दूसरी ओर, यदि चीन अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध करते हुए ईरान के साथ व्यापार जारी रखता है, तो अमेरिकी अभियान की प्रभावशीलता सीमित हो सकती है। यही कारण है कि वाशिंगटन के लिए बीजिंग का रुख रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
वेंस द्वारा चीन को “more responsible” बताना भी अमेरिका-चीन संबंधों के संदर्भ में उल्लेखनीय है। दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव को लेकर कई मुद्दों पर गहरे मतभेद हैं। ऐसे में ईरान के मामले में किसी संभावित सहयोग की संभावना को अमेरिकी प्रशासन एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देख सकता है।
ईरान पर बढ़ता आर्थिक दबाव
ईरान पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण कई आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। नई अमेरिकी रणनीति का लक्ष्य उसकी तेल आय, विदेशी मुद्रा प्रवाह और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संपर्कों को और सीमित करना है।
अमेरिका का मानना है कि आर्थिक दबाव से ईरान की सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया जा सकता है। दूसरी ओर, तेहरान ने अमेरिकी आर्थिक दबाव को “आर्थिक आतंकवाद” बताया है और कहा है कि ऐसी नीतियां अपने उद्देश्य में सफल नहीं होंगी।
वैश्विक तेल बाजार पर भी असर
ईरान की अर्थव्यवस्था और उसके तेल निर्यात पर दबाव का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। खासकर Strait of Hormuz की स्थिति इस पूरे विवाद में महत्वपूर्ण है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम है और यहां किसी भी बड़े व्यवधान से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव हो सकता है।
अमेरिकी आर्थिक अभियान जितना व्यापक होगा, बाजार उतना ही यह आकलन करेगा कि ईरान अपनी तेल बिक्री और निर्यात के लिए वैकल्पिक रास्ते कितनी तेजी से विकसित कर सकता है।
क्या चीन वास्तव में अमेरिका के साथ आएगा?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि वेंस के बयान का व्यावहारिक अर्थ कितना व्यापक है। अमेरिका चीन को ईरान के खिलाफ अपनी आर्थिक रणनीति में सहयोगी बनाना चाहता है, लेकिन बीजिंग ने अब तक सार्वजनिक रूप से अमेरिकी प्रतिबंध नीति का समर्थन नहीं किया है।
इसलिए चीन का “willing to play ball” होना फिलहाल अमेरिकी उपराष्ट्रपति का आकलन है, न कि चीन की ओर से घोषित औपचारिक नीति। आने वाले दिनों में बीजिंग की ओर से कोई स्पष्ट बयान या ठोस आर्थिक कदम इस दावे की वास्तविकता को स्पष्ट कर सकता है।
यदि चीन वास्तव में अमेरिकी अभियान के साथ सीमित या व्यापक स्तर पर सहयोग करता है, तो ईरान पर आर्थिक दबाव कई गुना बढ़ सकता है। लेकिन यदि बीजिंग अपने मौजूदा व्यापारिक संबंध बनाए रखता है, तो अमेरिका के लिए ईरान की आर्थिक घेराबंदी को पूरी तरह प्रभावी बनाना कठिन रहेगा।
कुल मिलाकर, वेंस का बयान अमेरिका-चीन-ईरान त्रिकोण में एक नया कूटनीतिक संकेत है। फिलहाल चीन के वास्तविक रुख पर नजर बनी हुई है और आने वाले दिनों में उसके आधिकारिक कदम यह तय करेंगे कि वेंस का दावा महज कूटनीतिक संकेत है या वास्तव में वॉशिंगटन और बीजिंग ईरान के खिलाफ आर्थिक मोर्चे पर किसी साझा रणनीति की ओर बढ़ रहे हैं।
