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8 अक्टूबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो): हार्ट अटैक, एंजियोप्लास्टी, बाईपास सर्जरी या किसी अन्य गंभीर हृदय संबंधी घटना के बाद मरीज का इलाज अस्पताल से छुट्टी मिलने के साथ खत्म नहीं होता। इसके बाद की रिकवरी में कार्डियक रिहैबिलिटेशन (Cardiac Rehabilitation) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह एक संरचित, चिकित्सकीय निगरानी वाला कार्यक्रम है, जिसमें व्यायाम के साथ पोषण, दवाओं के पालन, वजन, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान छोड़ने और मानसिक स्वास्थ्य जैसे पहलुओं पर भी काम किया जाता है।

हालांकि, भारत में कार्डियक रिहैबिलिटेशन की जरूरत और उपलब्ध सेवाओं के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। 2020 के भारतीय डेटा के वैश्विक ऑडिट में केवल 23 केंद्रों की पहचान हुई थी और अनुमान लगाया गया था कि हर साल जरूरत के मुकाबले लगभग 33 लाख अतिरिक्त कार्डियक रिहैबिलिटेशन स्थानों की आवश्यकता है। अध्ययन में रेफरल की कमी और वित्तीय संसाधनों की कमी को प्रमुख बाधाओं में पाया गया था।

कार्डियक रिहैबिलिटेशन आखिर है क्या?

कार्डियक रिहैबिलिटेशन को केवल जिम या सामान्य एक्सरसाइज प्रोग्राम समझना सही नहीं है। यह मरीज की स्थिति के अनुसार तैयार किया जाने वाला बहु-विषयक उपचार और रिकवरी कार्यक्रम है।

इसमें आमतौर पर डॉक्टर, फिजियोथेरेपिस्ट, डाइटिशियन और अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ मिलकर मरीज की जरूरत के अनुसार योजना बनाते हैं। इसमें सुरक्षित शारीरिक गतिविधि, पोषण संबंधी सलाह, वजन और ब्लड प्रेशर का प्रबंधन, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण, धूम्रपान छोड़ने में मदद और मनोवैज्ञानिक सहयोग शामिल हो सकते हैं।

यानी इसका उद्देश्य मरीज को सिर्फ “चलने” या “व्यायाम करने” के लिए कहना नहीं, बल्कि दोबारा सक्रिय और सुरक्षित जीवन की ओर लौटने में मदद करना है।

पूरा कार्यक्रम करना क्यों महत्वपूर्ण है?

कार्डियक रिहैबिलिटेशन का फायदा तभी पूरी तरह मिल सकता है जब मरीज इसे शुरू करने के बाद नियमित रूप से जारी रखे। केवल एक-दो सत्र में शामिल होना और फिर कार्यक्रम छोड़ देना इसके संभावित लाभ को सीमित कर सकता है।

2023 AHA/ACC दिशानिर्देशों के अनुसार, हाल में हार्ट अटैक, PCI यानी एंजियोप्लास्टी या CABG यानी बाईपास सर्जरी से गुजर चुके मरीजों में कार्डियक रिहैबिलिटेशन से बेहतर परिणाम देखे गए हैं। इसमें मृत्यु के जोखिम, दोबारा अस्पताल में भर्ती होने और जीवन की गुणवत्ता जैसे परिणामों में सुधार शामिल है।

अमेरिका के Million Hearts कार्यक्रम के आंकड़ों के अनुसार, 36 कार्डियक रिहैबिलिटेशन सत्र पूरे करने वाले मरीजों में केवल एक सत्र लेने वालों की तुलना में मृत्यु और दोबारा हार्ट अटैक का जोखिम कम पाया गया है। हालांकि ये आंकड़े भारत की आबादी के लिए सीधे लागू नहीं किए जाने चाहिए, वे कार्यक्रम में नियमित भागीदारी के महत्व को दर्शाते हैं।

भारत में सबसे बड़ी समस्या: जरूरत है, लेकिन पहुंच सीमित

भारत में कार्डियक रिहैबिलिटेशन को लेकर समस्या केवल मरीजों की अनिच्छा नहीं है। उपलब्ध शोध में स्वास्थ्य व्यवस्था और कार्यक्रमों से जुड़ी कई बाधाएं सामने आई हैं।

भारतीय केंद्रों के अध्ययन में रेफरल की कमी, वित्तीय संसाधनों की कमी और सीमित क्षमता प्रमुख समस्याओं के रूप में सामने आईं। कई मरीजों को अपनी जेब से भुगतान करना पड़ता है।

2025 की एक समीक्षा ने भी भारत में सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर, अपर्याप्त फंडिंग, कम जागरूकता और शहरी-ग्रामीण असमानता को प्रमुख चुनौतियां बताया। समीक्षा में टेली-रिहैबिलिटेशन, सामुदायिक कार्यक्रम और एकीकृत बहु-विषयक मॉडल को संभावित समाधान के रूप में रेखांकित किया गया।

मरीज कार्यक्रम बीच में क्यों छोड़ देते हैं?

कार्डियक रिहैबिलिटेशन पूरा नहीं करने के पीछे कई व्यक्तिगत और व्यावहारिक कारण हो सकते हैं।

यात्रा और परिवहन: कई मरीजों के लिए बार-बार अस्पताल या रिहैब सेंटर पहुंचना मुश्किल होता है।

काम का नुकसान: रोजाना या नियमित सत्रों के लिए काम से छुट्टी लेना उन मरीजों के लिए आर्थिक समस्या बन सकता है जो दिहाड़ी या अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं।

परिवार की जिम्मेदारियां: बुजुर्ग माता-पिता, बच्चों या अन्य परिवार के सदस्यों की देखभाल भी नियमित भागीदारी में बाधा बन सकती है।

जानकारी की कमी: कुछ मरीज यह नहीं जानते कि कार्डियक रिहैबिलिटेशन उनके उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत में स्वास्थ्यकर्मियों के अनुभवों पर आधारित शोध में भी रेफरल की कमी, मरीजों को इसके लाभ का पर्याप्त एहसास न होना, अस्पतालों में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और प्रशिक्षित स्टाफ की सीमित उपलब्धता जैसी समस्याएं सामने आई हैं।

डॉक्टर की सलाह और शुरुआती रेफरल बेहद महत्वपूर्ण

2026 ESC कार्डियक रिहैबिलिटेशन दिशानिर्देशों में बताया गया है कि मरीजों को समय पर रेफर करना और स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा व्यक्तिगत रूप से इसके फायदे समझाना भागीदारी बढ़ाने में मदद कर सकता है। दिशानिर्देशों के अनुसार, ऑटोमैटिक रेफरल सिस्टम और स्वास्थ्यकर्मी की सक्रिय भूमिका से enrollment और participation में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।

इसका मतलब है कि मरीज को अस्पताल से छुट्टी देते समय केवल दवाओं की सूची देना पर्याप्त नहीं हो सकता। उसके लिए यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कार्डियक रिहैबिलिटेशन कब शुरू करना है, कहां उपलब्ध है और कितने समय तक करना है।

घर से होने वाली रिहैबिलिटेशन भी बन सकती है विकल्प

हर मरीज के लिए अस्पताल जाकर कार्डियक रिहैबिलिटेशन करना संभव नहीं होता। ऐसे मामलों में home-based और remote cardiac rehabilitation उपयोगी विकल्प हो सकते हैं।

AHA/ACC दिशानिर्देशों के अनुसार, जिन मरीजों के लिए सेंटर आधारित कार्यक्रम में जाना कठिन है, उनके लिए घर से किए जाने वाले मॉडल पर भी विचार किया जा सकता है।

भारत जैसे बड़े देश में टेली-रिहैबिलिटेशन और सामुदायिक कार्यक्रमों का विस्तार विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि इससे बड़े शहरों के बाहर रहने वाले मरीजों तक सेवाएं पहुंचाने में मदद मिल सकती है।

परिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण

कार्डियक रिहैबिलिटेशन को पूरा कराने में परिवार का सहयोग महत्वपूर्ण हो सकता है। परिवार के सदस्य मरीज को नियमित सत्रों में जाने, दवाएं समय पर लेने, धूम्रपान छोड़ने, खान-पान में बदलाव करने और शारीरिक गतिविधि बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

साथ ही मरीज को यह समझना जरूरी है कि रिहैबिलिटेशन का उद्देश्य केवल तत्काल रिकवरी नहीं, बल्कि भविष्य में दोबारा हृदय संबंधी समस्या के जोखिम को कम करना और जीवन की गुणवत्ता बेहतर करना है।

भारत में completion rate सुधारना क्यों जरूरी?

कार्डियक रिहैबिलिटेशन की सफलता केवल यह देखकर नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने मरीजों को रेफर किया गया। यह भी देखना जरूरी है कि कितने मरीज वास्तव में कार्यक्रम में शामिल हुए, कितने नियमित रहे और कितनों ने निर्धारित कार्यक्रम पूरा किया।

2026 ESC दिशानिर्देश भी enrollment, adherence और completion को अलग-अलग चरणों के रूप में देखते हैं और मानते हैं कि इन सभी स्तरों पर सुधार की जरूरत है। वैश्विक स्तर पर कार्डियक रिहैबिलिटेशन का इस्तेमाल अभी भी काफी कम है।

भारत में इसलिए केवल नए रिहैब सेंटर खोलना पर्याप्त नहीं होगा। समय पर रेफरल, मरीजों की काउंसलिंग, सस्ती सेवाएं, प्रशिक्षित स्टाफ, बीमा या सार्वजनिक वित्तीय सहायता और घर-आधारित मॉडल को साथ लेकर चलना होगा।

दिल के मरीजों के लिए संदेश

कार्डियक रिहैबिलिटेशन को “वैकल्पिक” या केवल फिटनेस कार्यक्रम मानने के बजाय हृदय संबंधी बीमारी के बाद की समग्र देखभाल का हिस्सा समझना जरूरी है। डॉक्टर द्वारा सलाह दिए जाने पर मरीज को कार्यक्रम के बारे में सवाल पूछने चाहिए और अपनी व्यावहारिक समस्याओं—जैसे दूरी, काम या लागत—के बारे में स्वास्थ्य टीम को बताना चाहिए।

कई मामलों में कार्यक्रम का स्वरूप मरीज की जरूरत के अनुसार बदला जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मरीज बिना चिकित्सकीय सलाह के भारी व्यायाम शुरू न करे और निर्धारित उपचार को स्वयं बंद न करे।

स्वास्थ्य संबंधी अस्वीकरण: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। हार्ट अटैक, एंजियोप्लास्टी, बाईपास या अन्य हृदय संबंधी बीमारी के बाद व्यायाम और रिहैबिलिटेशन की शुरुआत तथा उसकी तीव्रता का निर्णय अपने कार्डियोलॉजिस्ट या कार्डियक रिहैबिलिटेशन टीम की सलाह के अनुसार करें।

Bharat Baani Bureau

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