29 जुलाई 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : नई दिल्ली: किडनी फेल होने वाले मरीजों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट अक्सर जीवन का दूसरा मौका साबित होता है। पहले केवल समान ब्लड ग्रुप (ABO-Compatible) वाले डोनर से ही प्रत्यारोपण संभव माना जाता था, लेकिन आधुनिक चिकित्सा तकनीकों ने ABO-असंगत (ABO-Incompatible) किडनी ट्रांसप्लांट को भी सफल बनाया है।
क्या होता है ABO-असंगत ट्रांसप्लांट?
ABO-असंगत किडनी ट्रांसप्लांट में डोनर और मरीज का ब्लड ग्रुप अलग होता है। सामान्य परिस्थितियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) अलग ब्लड ग्रुप वाले अंग को विदेशी मानकर उस पर हमला कर सकती है, जिससे प्रत्यारोपित किडनी असफल हो सकती है।
इसे सफल कैसे बनाया जाता है?
डॉक्टर प्रत्यारोपण से पहले मरीज के शरीर में मौजूद उन एंटीबॉडीज़ को कम करते हैं, जो डोनर की किडनी पर हमला कर सकती हैं। इसके लिए विशेष दवाओं, प्लाज़्माफेरेसिस (Plasmapheresis) जैसी प्रक्रिया और इम्यूनोसप्रेसिव उपचार का उपयोग किया जाता है। ट्रांसप्लांट के बाद भी मरीज को नियमित रूप से प्रतिरक्षा दबाने वाली दवाएं दी जाती हैं ताकि नई किडनी सुरक्षित रहे।
किन मरीजों को होता है फायदा?
ABO-असंगत ट्रांसप्लांट उन मरीजों के लिए उम्मीद की किरण है, जिन्हें परिवार में इच्छुक डोनर तो मिल जाता है, लेकिन ब्लड ग्रुप अलग होने के कारण पहले प्रत्यारोपण संभव नहीं हो पाता था। इस तकनीक से मरीजों की प्रतीक्षा अवधि कम हो सकती है और जीवित डोनर से ट्रांसप्लांट की संभावना बढ़ जाती है।
क्या हैं चुनौतियां?
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के ट्रांसप्लांट में संक्रमण और अंग अस्वीकृति (रिजेक्शन) का जोखिम सामान्य प्रत्यारोपण की तुलना में अधिक हो सकता है। इसलिए मरीज की सावधानीपूर्वक जांच, अनुभवी ट्रांसप्लांट टीम और नियमित फॉलो-अप बेहद जरूरी होते हैं।
चिकित्सकों का कहना है कि सही मरीजों का चयन और आधुनिक उपचार पद्धतियों की मदद से ABO-असंगत किडनी ट्रांसप्लांट की सफलता दर में लगातार सुधार हो रहा है, जिससे हजारों मरीजों को नया जीवन मिल रहा है।
