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16 सितंबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मेल-इन बैलेट पर नए प्रतिबंध लागू करने की उनकी प्रशासन की कोशिश को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के नवंबर मध्यावधि चुनावों से पहले अमेरिकी डाक सेवा (USPS) के जरिए मेल से मतदान पर नए नियम लागू करने की प्रशासन की मांग को खारिज कर दिया। फैसले के बाद ट्रंप ने सोशल मीडिया पर अदालत पर तीखा हमला करते हुए कहा कि “सुप्रीम कोर्ट ने वास्तव में हमारे देश को निराश किया है।”

ट्रंप ने विशेष रूप से उन न्यायाधीशों पर निशाना साधा जिन्हें उन्होंने अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया था। उन्होंने कहा कि ये वही लोग नहीं हैं जिनका उन्होंने अदालत के लिए चयन किया था। उनके अनुसार, अदालत के कुछ फैसलों ने अमेरिका को नुकसान पहुंचाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

14 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन की आपात अपील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। प्रशासन चाहता था कि USPS को मेल-इन बैलेट के लिए नए नियम लागू करने की अनुमति दी जाए। इन नियमों में राज्यों से मतदाताओं की जानकारी उपलब्ध कराने और डाक से भेजे जाने वाले मतपत्रों के लिए USPS द्वारा स्वीकृत विशेष लिफाफे और बारकोड जैसी आवश्यकताएं शामिल थीं। गैर-अनुपालन वाले मतपत्रों को अस्वीकार किए जाने की संभावना भी नियमों में थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निचली अदालत का वह आदेश प्रभावी बना रहा, जिसने नए नियमों को लागू करने पर रोक लगाई थी। इससे नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों के लिए राज्यों में पहले से इस्तेमाल हो रही मेल-इन वोटिंग व्यवस्था फिलहाल जारी रहेगी।

ट्रंप ने अपने ही नियुक्त न्यायाधीशों की आलोचना की

फैसले के बाद ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ न्यायाधीशों पर सीधे निशाना साधा। उन्होंने विशेष रूप से नील गोरसच, एमी कोनी बैरेट और ब्रेट कावानॉ के रुख पर नाराजगी जताई। वहीं, न्यायमूर्ति क्लेरेंस थॉमस और सैमुअल एलिटो ने प्रशासन के पक्ष में असहमति दर्ज की, जिसकी ट्रंप ने प्रशंसा की।

रिपोर्टों के मुताबिक, न्यायमूर्ति कावानॉ ने फैसले से सहमति जताते हुए अलग राय लिखी। उन्होंने कहा कि भले ही प्रशासन के पास कुछ बदलाव करने का कानूनी अधिकार होने की संभावना पर विचार किया जा सकता है, लेकिन आगामी चुनाव से महज कुछ सप्ताह पहले इतने बड़े बदलाव लागू करना राज्यों और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के लिए व्यावहारिक रूप से कठिन होगा।

ट्रंप की मेल-इन वोटिंग पर पुरानी आपत्तियां

ट्रंप लंबे समय से मेल-इन वोटिंग को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उनके प्रशासन ने मार्च में एक कार्यकारी आदेश के जरिए USPS से चुनावी डाक के लिए नए लिफाफे, ट्रैकिंग और मतदाता सूची से संबंधित आवश्यकताएं विकसित करने को कहा था। प्रशासन ने इन बदलावों को चुनाव सुरक्षा और मतपत्रों की निगरानी से जोड़कर पेश किया।

हालांकि, चुनाव अधिकारियों और मतदान अधिकार संगठनों ने तर्क दिया कि चुनाव से ठीक पहले नई व्यवस्था लागू करने से मतदाताओं और प्रशासन दोनों के लिए भ्रम पैदा हो सकता है। निचली अदालतों ने भी नए नियमों के कानूनी अधिकार और उन्हें लागू करने के समय को लेकर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्या बदलेगा?

फिलहाल इस फैसले का सबसे सीधा असर यह है कि 2026 के मध्यावधि चुनावों में राज्यों को मौजूदा मेल-इन वोटिंग प्रक्रियाओं के तहत काम करने की अनुमति रहेगी। नए USPS नियमों के तहत बारकोड वाले लिफाफे, संघीय पोर्टल पर अतिरिक्त मतदाता जानकारी और उससे जुड़े अनुपालन मानकों को इस चुनाव चक्र में लागू नहीं किया जा सकेगा।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका में मेल के जरिए मतदान चुनाव प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा है। रॉयटर्स के अनुसार, 2024 में लगभग एक-तिहाई अमेरिकी मतदाताओं ने मेल के जरिए मतदान किया था। चुनाव अधिकारियों ने कहा है कि मौजूदा व्यवस्था के तहत इस साल भी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

अटॉर्नी जनरल ने ट्रंप का किया बचाव

ट्रंप की सुप्रीम कोर्ट आलोचना के बीच अमेरिकी अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश ने राष्ट्रपति का बचाव किया। उन्होंने कहा कि ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को लेकर अपनी चिंताएं सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने का अधिकार है। साथ ही प्रशासन ने स्पष्ट किया कि वह अदालत के फैसले का पालन करेगा।

ब्लांश का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रंप की अदालत पर तीखी सार्वजनिक टिप्पणियों के बावजूद प्रशासन को न्यायपालिका के आदेशों का पालन करना होगा।

चुनाव प्रक्रिया पर बहस जारी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मेल-इन वोटिंग को लेकर अमेरिकी राजनीतिक बहस खत्म नहीं हुई है। ट्रंप प्रशासन इसे चुनाव सुरक्षा से जोड़ता रहा है, जबकि विरोधी पक्ष का कहना है कि चुनाव से कुछ सप्ताह पहले व्यापक प्रशासनिक बदलाव लागू करने से वैध मतपत्रों के निपटारे में परेशानी हो सकती थी।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने 2026 के मध्यावधि चुनावों के लिए मेल-इन बैलेट की मौजूदा प्रक्रिया को बनाए रखा है। वहीं ट्रंप की तीखी प्रतिक्रिया ने राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के बीच न्यायपालिका की भूमिका और चुनाव प्रशासन के अधिकार को लेकर चल रही बहस को फिर सामने ला दिया है।

Bharat Baani Bureau

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